सनातन धर्म का पतन किस प्रकार हुआ ? जानिए मुख्य कारण। 1
वैदिक धर्म

सनातन धर्म का पतन किस प्रकार हुआ ? जानिए मुख्य कारण।

बात सतयुग की है । सतयुग में शिक्षा को विशेष महत्व दिया जाता था और मनुष्यों में ज्ञान बहुत ही महत्वपूर्ण विषय हुआ करता था जो द्वापर युग के अंत तक प्रचलित रहा । उस समय के राजा अपने दरबार में शास्त्रार्थ का आयोजन करवाते थे । शास्त्रार्थ में जो विजयी होता उसे पुरुस्कृत किया जाता था । कुछ शास्त्रार्थ ऐसे भी हुआ करते थे जिनमे हारने वाले को दंड देने की शर्त रखी जाती थी ।

 उदाहरण के तौर पर राजा जनक के दरबार में बंदी और कहोड़ के बीच हुए शास्त्रार्थ को लिया जा सकता है जिसमे कहोड़ को हारने के बाद जल समाधी लेनी पड़ी थी । बाद में बंदी को कहोड़ के पुत्र अष्टावक्र ने शास्त्रार्थ में हराया और उन्हें उनकी भूल के बारे में समझा कर क्षमा कर दिया , इसके बाद दण्डित करने की प्रथा बंद हो गयी ।

 उस समय के समाज को मनुष्य के गुण , शिक्षा और ज्ञान के आधार पर व्यवस्थित किया गया था ,बाल्य काल में बच्चे वेद और शास्त्रों के अध्ययन के लिए गुरुकुल में जाते थे जहा से उनके भविष्य का निर्माण होता था ।

 समाज में जो मनुष्य अध्ययन करने नहीं जाते थे या अध्ययन के समय ज्ञान प्राप्त करने में असफल होते थे उनको सेवा का कार्य दिया जाता था और उन्हें शूद्र की श्रेणी में रखा जाता था या वो शूद्र कहलाते थे, और जो मनुष्य व्यव्हार कुशल और व्यापार के ज्ञान में निपुण होते थे उन्हें व्यापर करने का कार्य दिया जाता था और वे वैश्य कहलाते थे, और जो मनुष्य बलवान और शस्त्र विद्या में निपुण होते थे उन्हें सेना में रखा जाता था जो सुरक्षा का कार्य करते थे इन्हें क्षत्रिय कहा जाता था, और जो मनुष्य ज्ञान में सर्वोच्च होते और सभी प्रकार की विध्याओ में निपुण होते उन्हें शोध कार्य, समाज को शिक्षित करना, ज्ञान के प्रचार प्रसार आदि के लिए नियुक्त किया जाता और वे ब्राह्मण कहलाते थे ।

 इनमे सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कोई भी मनुष्य किसी भी श्रेणी में जाने के लिए पूर्णत: स्वतंत्र था । इसे ठीक उसी प्रकार समझा जा सकता है जैसे आज अनपढ़ गंवार अशिक्षित व्यक्ति मजदूरी ( सेवा कार्य यानि शूद्र पद )करता है और वही व्यक्ति शिक्षा प्राप्त करके अपने शरीर को मजबूत बना सेन्य बल की परीक्षा देकर अपनेआप को सिद्ध करता है और सेना ( सुरक्षा कार्य यानि क्षत्रिय पद ) में नियुक्त होता है ।

 आज का युग जो कलयुग के नाम से जाना जाता है उसका वह मनुष्य जो अपने आप को विद्वान समझता है उसे अगर सतयुग के आधार पर देखा जाये तो वह मुर्ख की श्रेणी में आएगा । कलयुग के शुरुआती चरण में ही शिक्षा का पतन होना शुरु हो गया था जो कि आज पतन की चरम सीमा पर है ।

अधर्म अन्याय और कुरीतियों ने मनुष्य को अपना ग्रास बना लिया । ब्राह्मण पुत्र अल्प अध्ययन या बिना वेद शास्त्रों के अध्ययन के अपने आप को ब्राह्मण कहने लगे , क्षत्रिय पुत्र बिना अध्ययन और शस्त्र विद्या प्राप्त किये अपने आप को क्षत्रिय कहने लगे, शूद्र पुत्रों ने शिक्षा के आभाव में सेवा कार्य अपना लिया और वे हमेशा शूद्र ही कहे जाने लगे ।

 और धीरे धीरे ये समाज की उत्तम व्यवस्था जाती के रूप में परिवर्तित हो गयी । तथा कथित ब्राह्मणों ने अल्प शिक्षित होने के कारण कपोल कल्पित कहानियाँ बना के अपने पेट पालन के लिए समाज को मुर्ख बनाना शुरू कर दिया और इसी प्रकार सनातन धर्म का पतन होना शुरू हो गया । उसके बाद आक्रमणकारी भारत में आये पहले मुग़ल फिर अंग्रेज जिन्होंने सनातन धर्म की परिभाषा ही बदल दी, सभी धर्म ग्रन्थ मिलावट करके नष्ट कर दिए गए ।

आज के युग में सनातन धर्म से सम्बंधित लोग हिन्दू के नाम से जाने जाते हैं । जिनमें से कुछ जो जागरुक और बुद्धिजीवी हैं वे सनातन धर्म की पुन: स्थापना के लिए प्रयासरत हैं और अपने ही धर्म ग्रंथो में सत्य-असत्य के बीच में उलझे हुए सत्य की खोज में लगे हुए हैं ।

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